tag:blogger.com,1999:blog-232622322007-10-17T13:22:50.336-07:00Assorted PoetryMoglihttp://www.blogger.com/profile/10882385754551486879noreply@blogger.comBlogger21125tag:blogger.com,1999:blog-23262232.post-28871392105147091512007-10-17T13:22:00.001-07:002007-10-17T13:22:50.369-07:00क्या करेंमेरी, तेरी, निगाह में<br />जो लाख इन्तेज़ार हैं<br /><br />जो मेरे, तेरे तन बदन में<br />लाख दिल फ़िगार हैं<br /><br />जो मेरी, तेरी उंगलियों की बेहिसी से<br />सब कलम निज़ार हैं<br /><br />जो मेरे, तेरे शहर की<br />हर इक गली में<br />मेरे, तेरे नक्श-ए-पा के बेनिशां मज़ार हैं<br /><br />जो मेरी, तेरी रात के<br />सितारे ज़ख्म ज़ख्म हैं<br /><br />जो मेरी, तेरी सुबह के<br />गुलाब चाक चाक हैं<br /><br />ये ज़ख्म सारे बे-दवा<br />ये चाक सारे बे-रफ़ू<br />किसी पे राख चांद की<br />किसी पे ओस का लहू<br />ये हैं भी या नहीं बता<br />ये हैं की महज़ जाल हैं<br />मेरे तुम्हारे अन्कबूत-ए-वहम क बुना हुआ<br />जो है, तो इस का क्या करें<br />नही है, तो भी क्या करें<br />बता, बता<br />बता, बता<br /><br />फैज़, १९८०<br />मेरे दिल, मेरे मुसाफिरMoglihttp://www.blogger.com/profile/10882385754551486879noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-23262232.post-87861274748750044322007-09-09T14:10:00.000-07:002007-09-09T14:11:06.554-07:00तन्हाईतन्हाई<br />फिर कोई आया, दिल-ए-ज़ार, नहीं कोई नहीं,<br />राहरू होगा, कहीं और चला जायेगा<br />ढल चुकी रात, बिखरने लगा तारों का गुबार,<br />लड़खड़ाने लगे ऐवानों में ख्वाबीदा चिराग़.<br /><br />सो गई रास्ता तक तक हर इक राहगुज़ार<br />अजनबी ख़ाक ने धुंधला दिये कदमों के सुराग़.<br />गुल करो शमाएं, बढ़ा दो मै-ओ-मीना-ओ-अयाग.<br />अपने बेख्वाब किवाड़ों को मुकफ़्फ़ल कर लो,<br />अब यहां कोई नहीं, कोई नहीं आयेगा.<br /><br />नक्श-ए-फ़रियादी<br />फैज़<br />१९४१ <br /><br /><br /><br /><br /><br />Tanhai (Solitude)<br />Who goes there, O heart bereaved? No one, no one,<br />A wayfarer perhaps, who will go elsewhere.<br />Night has waned, the dust of stars is scattering;<br />In great halls the sleepy lamps are fluttering,<br />Tired of the vigil, all roads have gone to sleep,<br />Alien dust has dimmed the bright trace of feet.<br />Put out the lights! take away the wine, goblet and flash!<br />Lock up your sleepless doors, O solitary heart.<br />No one will come here now, no one, no one.<br /><br />Naqsh-e-Faryadi<br />Faiz<br />1941Moglihttp://www.blogger.com/profile/10882385754551486879noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-23262232.post-60329453077130630822007-09-08T22:20:00.000-07:002007-09-09T14:08:31.945-07:00यादयाद<br /><br />दश्त-ए-तन्हाई में, ऐ जान-ए-जहान, लर्ज़ां हैं<br />तेरी आवाज़ के साये, तेरे होठों के सराब,<br />दश्त-ए-तन्हाई में दूरी के ख़स-ओ-ख़ाक तले<br />खिल रहे हैं तेरे पेहलू के समन-ओ-गुलाब.<br /><br />उठ रही है कहीं करीब से तेरी सांस की आंच<br />अपनी खुश्बू में सुलगती हुई मद्धम मद्धम<br />दूर, उफ़ाक पार, चमकाती हुई कतरा कतरा<br />गिर रही है तेरी दिलदार नज़र की शबनम<br /><br />इस कदर प्यार से, ऐ जान-ए-जहान, रक्खा है<br />दिल के रुख्सार पे इस वक्त तेरी याद ने हाथ<br />यों गुमान होता है, गर्चे है अभी सुभ-ए-फ़िराक<br />ढल गया हिज्र का दिन, आ भी गयी वस्ल की रात.<br /><br />फैज़<br />१९५३Moglihttp://www.blogger.com/profile/10882385754551486879noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-23262232.post-1146949662593414262006-05-06T13:57:00.000-07:002006-05-06T14:07:42.603-07:00सोच-फैज़क्यूं मेरा दिल शाद नहीं है क्यूं खामोश रहा करता हूं<br /> छो़डो मेरी राम कहानी मैं जैसा भी हूं अच्छा हूं<br /><br />मेरा दिल गमग़ीं है तो क्या गमगीं ये दुनिया है सारी<br />ये दुख तेरा है न मेरा हम सब की जागीर है प्यारी<br /><br />तू गर मेरी भी हो जाये दुनिया के गम यूं ही रहेंगे<br />पाप के फ़न्दे, ज़ुल्म के बन्धन अपने कहे से कट न सकेंगे<br /><br />गम हर हालत में मोहलिक है अपना हो या और किसी का<br /> रोना धोना, जी को जलाना यूं भी हमारा, यूं भी हमारा<br /><br />क्यूं न जहां का गम अपना लें बाद में सब तदबीरें सोचें<br />बाद में सुख के सपने देखें सपनों की ताबीरें सोचें<br /><br />बे-फ़िक्रे धन दौलत वाले ये आखिर क्यूं खुश रहते हैं<br /> इनका सुख आपस में बाटें ये भी आखिर हम जैसे हैं<br /><br />हम ने माना जंग कड़ी है सर फूटेंगे,खून बहेगा<br /> खून में गम भी बह जायेंगे हम न रहें, गम भी न रहेगाMoglihttp://www.blogger.com/profile/10882385754551486879noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-23262232.post-1146947207313278602006-05-06T13:25:00.000-07:002006-05-06T13:27:15.246-07:00दुआ-फैज़आईए हाथ उठायें हम भी<br />हम जिन्हें रस्म-ए-दुआ याद नहीं<br />हम जिन्हें सोज़-ए-मोहब्बत के सिवा<br />कोई बुत, कोई खुदा याद नहीं<br /><br />आईए अर्ज़ गुज़रें कि निगार-ए-हस्ती<br />ज़हर-ए-इमरोज़ में शीरीनी-ए-फ़र्दां भर दे<br />वो जिन्हें तबे गरांबारी-ए-अय्याम नहीं<br />उनकी पलकों पे शब-ओ-रोज़ को हल्का कर दे<br /><br />जिनकी आंखों को रुख-ए-सुबह का यारा भी नहीं<br />उनकी रातों में कोई शमा मुनव्वर कर दे<br />जिनके कदमों को किसी राह का सहारा भी नहीं<br />उनकी नज़रों पे कोई राह उजागर कर दे<br /><br />जिनका दीन पैरवे-ए-कज़्बो-रिया है उनको<br />हिम्मत-ए-कुफ़्र मिले, जुर्रत-ए-तहकीक मिले<br />जिनके सर मुन्ताज़िर-ए-तेग-ए-जफ़ा हैं उनको<br />दस्त-ए-कातिल को झटक देने की तौफ़ीक मिले<br /><br />इश्क का सर्र-ए-निहां जान-तपां है जिस से<br />आज इकरार करें और तपिश मिट जाये<br />हर्फ़-ए-हक दिल में खटकता है जो कांटे की तरह<br />आज इज़हार करें ओर खलिश मिट जाये ।Moglihttp://www.blogger.com/profile/10882385754551486879noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-23262232.post-1146946333547224132006-05-06T13:08:00.000-07:002006-05-06T13:12:13.560-07:00बहार आई-फैज़बहार आई तो जैसे एक बार<br />लौट आए हैं फिर अदम से<br />वो ख्ह्वाब सारे, शबाब सारे<br />जो तेरे होंठों पे मर मिटे थे<br />जो मिट के हर बार फिर जिए थे<br />निखर गये हैं गुलाब सारे<br />जो तेरी यादों से मुश्कबू हैं<br />जो तेरे उश्शाक का लहू हैं<br /><br />उबल पड़े हैं अज़ाब सारे<br />मलाल-ए-अहवाल-ए-दोस्तां भी<br />खुमार-ए-आगोश-ए-महवशां भी<br />गुबार-ए-खातिर के बाब सारे<br />तेरे हमारेसवाल सारे, जवाब सारे<br />बहार आई तो खुल गये हैं<br />नये सिरे से हिसाब सारे।Moglihttp://www.blogger.com/profile/10882385754551486879noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-23262232.post-1144945389649723112006-04-13T09:21:00.000-07:002006-04-13T09:23:09.670-07:00ना इश्क किया, ना काम किया-फैज़वो लोग बहोत खुशकिस्मत थे,<br />जो इश्क को काम समझते थे,<br />या काम से आशिकी करते थे<br /><br />हम जीते जी मसरूफ रहे<br /> ना इश्क किया,<br /> ना काम किया<br /><br />काम इश्क के आडे़ आता रहा<br />और इश्क से काम उलझता रहा<br />फिर आखिर तंग आकर हमने<br />दोनों को अधूरा छोड़ दियाMoglihttp://www.blogger.com/profile/10882385754551486879noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-23262232.post-1144561546501430692006-04-08T22:42:00.000-07:002006-04-08T22:45:46.516-07:00आखिरी ख़त-फैज़<p>वो वक़्त मेरी जान बहुत दूर नहीं है</p><p>जब दर्द से रुक जायेंगी सब ज़ीस्त की राहें</p><p>और हद से गुज़र जायेगा अन्दोहे-निहानी</p><p>थक जायेंगी तरसी हुई नाकाम निगाहें</p><p>छिन जायेंगे मुझसे मेरे आंसू मेरी आहें</p><p>छिन जायेगी मुझसे मेरी बेकार जवानी</p><p>शायद मेरी उल्फ़त को बहुत याद करोगी</p><p>अपने दिले-मासूम को नाशाद करोगी</p><p>आओगी मेरी गोर पे तुम अश्क बहाने</p><p>नौखे़ज़ बहारों के हसीं फूल चढ़ाने</p><p>शायद मेरी तुरबत को भी ठुकरा के चलोगी</p><p>शायद मेरी बेसूद वफ़ाओं पे हंसोगी</p><p>इस वज़'ए-करम का तुम्हें पास न होगा</p><p>लेकिन दिले-नाकाम को एहसास न होगा</p><p>अलक़िस्सा माआले-ग़मे-उल्फ़त पे हंसो तुम</p><p>या अश्क बहाती रहो, फ़रियाद करो तुम</p><p>माज़ी पे नदामत हो तु्म्हें या कि मसर्रत</p><p>खा़मोश पड़ा सोएगा बामांदा-ए-उल्फ़त</p><p>फैज़</p><p> </p><p><br />जीस्त-जीवन</p><p>अन्दोहे-निहानी-भीतरी दुख</p><p>नाशाद--कब्र</p><p>अश्क-आंसू</p><p>नौख़ेज़-नई</p><p>तुरबत-कब्र</p><p>वज़'ए-करम-करम का ढंग</p><p>अलकि़स्सा- संक्षेप</p><p>माआले-गमे-उल्फत-प्रेम के दुख के परिणाम से</p><p>माज़ी पे- अतीत पर</p><p>बामांदा-ए-उलफत- प्रेम के हाथों से श्रान्त</p>Moglihttp://www.blogger.com/profile/10882385754551486879noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-23262232.post-1143919855122486562006-04-01T11:29:00.000-08:002006-04-01T11:30:55.133-08:00दोंनों जहान तेरी मोहब्बत में हार के-फैज़<p>दोंनों जहान तेरी मोहब्बत में हार के<br />वो जा रहा है कोई शबे-ग़म गुज़ार के</p><p><br />वीरां है मैकदा ख़ुमो-साग़र उदास हैं<br />तुम क्या गए कि रूठ गए दिन बहार के</p><p><br />इक फुर्सते-गुनाह मिली, वो भी चार दिन<br />देखे हैं हमने हौसले परवरदिगार के</p><p><br />दुनिया ने तेरी याद से बेगाना कर दिया<br />तुझ से भी दिलफरेब हैं ग़म रोज़गार के</p><p><br />भूले से मुस्कुरा तो दिये थे वो आज फै़ज<br />मत पूछ वलवले दिले-नाकर्दाकार के</p><p><br />हम पर तुम्हारी चाह का इल्जा़म ही तो है<br />दुश्नाम तो नहीं है ये अक़ाम ही तो है</p><p><br />करते हैं जिसपे तअन कोई जुर्म तो नहीं<br />शौके-फिज़ूलो-उल्फ़ते-नाकाम ही तो है</p><p><br />दिल नाउमीद तो नहीं नाकाम ही तो है<br />लम्बी है ग़म की शाम मगर शाम ही तो है<br /></p><p>फैज़</p>Moglihttp://www.blogger.com/profile/10882385754551486879noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-23262232.post-1142807770936919052006-03-19T14:35:00.000-08:002006-03-19T14:36:10.946-08:00रात यूं दिल में - फैज़ (with translation)<p>रात यूं दिल में तेरी खोई हुई याद आई,<br />जैसे वीराने में चुपके से बहार आ जाए,<br />जैसे सहाराओं में हौले से चले बाद-ए-नसीम,<br />जैसे बीमार को बेवजह करार आ जाए</p><p><br />Last night your faded memory came to me<br />As in the wilderness spring comes quietly,<br />As, slowly, in the desert, moves the breeze,<br />As, to a sick man, without cause, comes peace</p>Moglihttp://www.blogger.com/profile/10882385754551486879noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-23262232.post-1142784572317801562006-03-19T08:08:00.000-08:002006-03-19T08:09:32.316-08:00अग्नि पथ-हरिवंश राय बच्चनअग्नि पथ, अग्नि पथ, अग्नि पथ !<br /><br />व्रिक्ष हों भले खड़े,<br />हों घने,हों बडे़,<br />एक पत्र-छाँह भी माँग मत, माँग मत,माँग मत!<br />अग्नि पथ, अग्नि पथ, अग्नि पथ !<br /><br />तू न थकेगा कभी!<br />तू न थमेगा कभी!<br />तू न मुड़ेगा कभी- कर शपथ, कर शपथ, कर शपथ!<br />अग्नि पथ, अग्नि पथ, अग्नि पथ !<br /><br />यह महान द्रश्य है-<br />चल रहा मनुष्य है<br />अश्रु-स्वेद-रक्त से लथपथ, लथपथ, लथपथ!<br />अग्नि पथ, अग्नि पथ, अग्नि पथ !Moglihttp://www.blogger.com/profile/10882385754551486879noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-23262232.post-1142784046307917992006-03-19T07:57:00.000-08:002006-03-19T08:00:46.320-08:00नव वर्ष- हरिवंश राय बच्चनवर्ष नव,<br />हर्ष नव,<br />जीवन उत्कर्ष नव<br /><br />नव उमंग,<br />नव तरंग,<br />जीवन का नव प्रसंग<br /><br />नवल चाह,<br /> नवल राह,<br />जीवन का नव प्रवाह<br /><br />गीत नवल,<br />प्रीति नवल,<br />जीवन की रीति नवल,<br />जीवन की नीति नवल,<br />जीवन की जीत नवलMoglihttp://www.blogger.com/profile/10882385754551486879noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-23262232.post-1142714579037099952006-03-18T12:39:00.000-08:002006-03-18T12:42:59.056-08:00रक़ीब से- फैज़ अहमद फैज़<p>आ कि वाबस्ता हैं उस हुस्न की यादें तुझ से<br />जिसने इस दिल को परीख़ाना बना रक्खा था</p><p>जिसकी उल्फ़त में भुला रक्खी थी दुनिया हमने<br />दहर को दहर का अफसाना बना रक्खा था</p><p>आशना हैं तेरे कदमों से वो राहें जिन पर<br />उसकी मदहोश जवानी ने इनायत की है</p><p>कारवां गुज़रे हैं जिन से उसी रा'नाई के<br />जिसकी इन आखों ने बेसूद इबादत की है</p><p>तुझसे खेली हैं वो महबूब हवाएं जिनमें<br />उसके मलबूस की अफ़सुर्दा महक बाकी है</p><p>तुझ पे भी बरसा है उस बाम से महताब का नूर<br />जिस में बीती हुई रातों की कसक बाकी है</p><p>तूने देखी है वो पेशानी, वो रूख़्सार, वो होंट<br />ज़िन्दगी जिनके तसव्वुर में लुटा दी हमने</p><p>तुझ पे उट्ठी हैं वो खोई हुई साहिर आंखे<br />तुझ को मालूम है क्यों उम्र गंवा दी हमने</p><p>हम पे मुश्तरिका हैं एहसान ग़मे-उल्फ़त के<br />इतने एहसान कि गिनवाऊं तो गिनवा न सकूं<br />हमने इस इश्क में क्या खोया है क्या सीखा है<br />जुज़ तेरे और को समझाऊं तो समझा न सकूं</p><p><br />अजिज़ी सीखी, गरीबों की हिमायत सीखी,<br />यासो-हिर्मार के, दुख-दर्द के माने सीखे<br />ज़ेरदस्तों के मुसाइब को समझना सीखा,<br />सर्द आहों के, रूखे़-ज़र्द के मने सीखे</p><p><br />जब कहीं बैठ के रोते हैं वो बेकस जिनके,<br />अश्क आंखो मे बिलकते हुए सो जाते हैं<br />नातुवानों के निवाले पे झपटते हैं उकाब़<br />बाज़ू तोले हुए मंडलाते हुए आते हैं</p><p><br />जब कभी बिकता है बाज़ार में मज़दूर का गोश्त<br />शाहराहों पे ग़रीबों का लहू बहता है<br />आग-सी सीने में रह-रह के उबलती है, न पूछ<br />अपने दिल पे मुझे काबू ही नहीं रहता है</p>Moglihttp://www.blogger.com/profile/10882385754551486879noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-23262232.post-1142709753791674792006-03-18T11:21:00.000-08:002006-03-18T11:22:33.803-08:00मुझसे पहली सी मोहब्बत मेरे महबूब ना मांग ! फैज़ अहमद फैज़<p>मुझसे पहली सी मोहब्बत मेरी महबूब ना मांग<br /><br />मैंने समझा था कि तू है तो दरख़्शा है हयात<br />तेरा ग़म है तो ग़मे-दहर का झ़गडा़ क्या है<br />तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात<br />तेरी आखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है</p><p><br />तू जो मिल जाये तो तकदीर निगूं हो जाए<br />यूं न था, मैंने फ़कत चाहा था यूं हो जाए</p><p><br />और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा<br />राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा<br />अनगिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म<br />रेशमों- अतलसो- कमख्वाब में बुनवाये हुए<br />जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म<br />खाक में लिथडे़ हुए, ख़ून में नहलाए हुए</p><p><br />जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से<br />पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से<br /><br />लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे<br />अब भी दिलकश है तेरा हुस्न मगर क्या कीजे<br />और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा<br />राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा</p>मुझसे पहली सी मोहब्बत मेरे महबूब ना मांग !Moglihttp://www.blogger.com/profile/10882385754551486879noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-23262232.post-1141596869329784022006-03-05T14:12:00.000-08:002006-03-05T14:14:29.346-08:00वर दे-सूर्यकांत त्रिपाठी निरालावर दे<br />वीणावंदिनि वर दे<br />प्रिय स्वतंत्र-रव अम्रत-मन्त्र नव<br />भारत में भर दे!<br /><br />काट अन्धउर को बन्धनस्तर<br />बहा जननि ज्योतिर्मय निरझर<br />कलुष-भेद-तम हर प्रकाश भर<br />जगमग जग कर दे<br /><br />नव गति, नव लय, ताल, छन्द नव,<br />नवल कण्ठ, नव जलद-मन्द रव,<br />नव नभ के नव विहग-व्रिन्द को,<br />नव पर नव स्वर दे!<br /><br /><br />सूर्यकांत त्रिपाठी निरालाMoglihttp://www.blogger.com/profile/10882385754551486879noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-23262232.post-1141595975914605772006-03-05T13:55:00.000-08:002006-03-05T13:59:35.923-08:00बच्चों कि लिए- इकबाललब पे आती है दुआ बन के तमन्ना मेरी<br />ज़िन्दगी शम्मअ़ की सूरत हो खुदाया मेरी<br /><br />दूर दुनिया का मेरे दम से अंधेरा हो जाये<br />हर जगह मेरे चमकने से उजाला हो जाए<br /><br />हो मेरे दम से युंही मेरे वतन की ज़ीनत<br />जिस तरह फूल से होती है चमन की ज़ीनत<br /><br />ज़िन्दगी हो मेरी परवाने की सूरत यारब<br />इल्म की शम्मअ़ से हो मुझको मोहब्बत<br /><br />हो मेरा काम ग़रीबों की हिमायत करना<br />दर्द-मन्दों से, ज़ईफों से मोहब्बत करना<br /><br /><br />मेरे अल्लाह! बुराई से बचाना मुझको<br />नेक जो राहा है उस पर चलाना मुझकोMoglihttp://www.blogger.com/profile/10882385754551486879noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-23262232.post-1141538111023882642006-03-04T21:54:00.000-08:002006-03-04T21:55:11.030-08:00गीत नया गाता हूँ-अटल बिहारी वाजपेयीगीत नया गाता हूँ-अटल बिहारी वाजपेयी<br /><br />टूटे हुए तारों से फूटे वासन्ती स्वर,<br />पत्थर की छाती में उग आया नव अंकुर,<br /><br />झरे सब पीले पात,<br />कोयल की कुहुक रात,<br /><br />प्राची में अरुणिमा की रेख देख पाता हूँ<br /><br />गीत नया गाता हूँ<br /><br />टूटे हुए सपने की सुने कौन सिसकी?<br />अन्तर को चीर व्यथा पलकों पर ठिठकी<br /><br />हार नहीं मानूँगा,<br />रार नई ठानूँगा,<br /><br />काल के कपाल पर लिखता-मिटाता हूँ<br />गीत नया गाता हूँMoglihttp://www.blogger.com/profile/10882385754551486879noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-23262232.post-1141439409765021722006-03-03T18:26:00.000-08:002006-03-03T18:30:09.776-08:00मानुस हौं तो वही रसखान<p>मानुस हौं तो वही रसखान, </p><p>बसौं मिलि गोकुल गाँव के ग्वारन।</p><p> </p><p>जो पसु हौं तो कहा बस मेरो, </p><p>चरौं नित नंद की धेनु मँझारन॥</p><p> </p><p>पाहन हौं तो वही गिरि को, </p><p>जो धर्यो कर छत्र पुरंदर कारन।</p><p> </p><p>जो खग हौं तो बसेरो करौं मिलि</p><p> कालिंदीकूल कदम्ब की डारन॥</p><p> </p><p>या लकुटी अरु कामरिया पर, </p><p>राज तिहूँ पुर को तजि डारौं।</p><p> </p><p>आठहुँ सिद्धि, नवों निधि को सुख,</p><p> नंद की धेनु चराय बिसारौं॥</p><p> </p><p>रसखान कबौं इन आँखिन सों, </p><p>ब्रज के बन बाग तड़ाग निहारौं।</p><p> </p><p>कोटिक हू कलधौत के धाम, </p><p>करील के कुंजन ऊपर वारौं॥</p><p> </p><p>सेस गनेस महेस दिनेस, </p><p>सुरेसहु जाहि निरंतर गावै।</p><p> </p><p>जाहि अनादि अनंत अखण्ड,</p><p> अछेद अभेद सुबेद बतावैं॥</p><p> </p><p>नारद से सुक व्यास रहे,</p><p> पचिहारे तू पुनि पार न पावैं।</p><p> </p><p>ताहि अहीर की छोहरियाँ, </p><p>छछिया भरि छाछ पै नाच नचावैं॥</p><p> </p><p>धुरि भरे अति सोहत स्याम जू,</p><p> तैसी बनी सिर सुंदर चोटी।</p><p> </p><p>खेलत खात फिरैं अँगना, </p><p>पग पैंजनी बाजति, पीरी कछोटी॥</p><p> </p><p>वा छबि को रसखान बिलोकत,</p><p> वारत काम कला निधि कोटी।</p><p> </p><p>काग के भाग बड़े सजनी, </p><p>हरि हाथ सों लै गयो माखन रोटी॥</p><p> </p><p>कानन दै अँगुरी रहिहौं, </p><p>जबही मुरली धुनि मंद बजैहै।</p><p> </p><p>माहिनि तानन सों रसखान, </p><p>अटा चड़ि गोधन गैहै पै गैहै॥</p><p> </p><p>टेरी कहाँ सिगरे ब्रजलोगनि, </p><p>काल्हि कोई कितनो समझैहै।</p><p> </p><p>माई री वा मुख की मुसकान, </p><p>सम्हारि न जैहै, न जैहै, न जैहै॥</p><p> </p><p>मोरपखा मुरली बनमाल, </p><p>लख्यौ हिय मै हियरा उमह्यो री।</p><p> </p><p>ता दिन तें इन बैरिन कों, </p><p>कहि कौन न बोलकुबोल सह्यो री॥</p><p> </p><p>अब तौ रसखान सनेह लग्यौ, </p><p>कौउ एक कह्यो कोउ लाख कह्यो री।</p><p> </p><p>और सो रंग रह्यो न रह्यो, </p><p>इक रंग रंगीले सो रंग रह्यो री।<br /></p><p>- रसखान<br /></p>Moglihttp://www.blogger.com/profile/10882385754551486879noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-23262232.post-1141325045255490202006-03-02T10:42:00.000-08:002006-03-02T10:45:53.496-08:00गुलों में रंग-फैज़ अहमद 'फैज़' (gulon mein rang)<p>गुलों में रंग भरे आज नौबहार चले<br />चले भी आओ कि गुलशन का कारोबार चले</p><p>कफस उदास है यारों सबा से कुछ तो कहो<br />कहीं तो बहर-ए-खुदा आज ज़िक्र-ए-यार चले</p><p>कभी तो सुबह तेरे कुंज-ए-लब से हो आग़ाज़<br />कभी तो शब सर-ए-काकुल से मुशकबार चले</p><p>बडा़ है दर्द का रिश्ता ये दिल गरीब सही<br />तुम्हारे नाम पे आएंगे गमगुसार चले</p><p>जो हम पे गुज़री सो गुज़री मगर शब-ए-हिजरां<br />हमारे अशक तेरी आकबत संवार चले<br /></p><p>मकाम 'फैज़' कोई राह में जँचा ही नहीं<br />जो कुए यार से निकले तो सुए दार चले</p><p><br />फैज़ अहमद 'फैज़'</p>Moglihttp://www.blogger.com/profile/10882385754551486879noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-23262232.post-1141276038246981742006-03-01T20:51:00.000-08:002006-03-01T21:07:18.253-08:00पुष्प की अभिलाषा- माखन लाल चतुर्वेदीचाह नहीं मैं सुरबाला के<br /> गहनों में गूँथा जाऊँ<br /><br />चाह नहीं मैं प्रेमी माला में<br /> बिंधप्यारी को ललचाऊँ<br /><br />चाह नहीं सम्राटों के शव पर,<br />हे हरि डाला जाऊँ<br /><br />चाह नहीं देवों के सर पर चढूँ,<br />भाग्य पर इठलाऊँ<br /><br />मुझे तोड़ लेना बन-माली,<br />उस पथ पर देना तुम फेंक<br /><br />मात्रभूमि पर शीश चढ़ाने<br />जिस पथ जायें वीर<br />पथ जायें वीर अनेक!Moglihttp://www.blogger.com/profile/10882385754551486879noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-23262232.post-1141275050233516142006-03-01T20:39:00.000-08:002006-03-01T20:50:50.243-08:00Meghdoot ke prati'मेघदूत' के प्रति-हरिवंश राय बच्चन<br />[महाकवि कालिदास के मेघदूत से साहित्यानुरागी संसार भलिभांति परिचित है<br /> उसे पढ़ कर जो भावनाएँ ह्रदय में जाग्रत होती हैं, उन्हें ही मैंने निम्नलिखित<br />कविता में पद्यबध्द किया है भक्त गंगा की धारा में खड़ा होता है और उसीके<br /> जल से अपनी अंजलि भरकर गंगा को समर्पित कर देता है इस अंजलि में<br /> उसका क्या रहता है, सिवा उसकी श्रध्दा के? मैंने भी महाकवि की मंदाक्रांता की<br /> मंद गति से प्रवाहित होने वाली इस कविता की मंदाकिनी के बीच खड़े हो कर,<br />इसी में कुछ अंजलि उठाकर इसीको अर्पित किया है<br /> इसमें भी मेरे अपनेपन का भाग केवल मेरी श्रध्दा ही है ]<br /><br />'मेघ' जिस जिस काल पढ़ता,<br />मैं स्वयं बन मेघ जाता!<br /><br />हो धरणि चाहे शरद की<br />चाँदनी में स्नान करती,<br />वायु ऋतु हेमंत की चाहे<br /> गगन में हो विचरती,<br /><br />हो शिशिर चाहे गिराता<br />पीत-जर्जर पत्र तरू के,<br />कोकिला चाहे वनों में,<br />हो वसंती राग भरती,<br /><br /> ग्रीष्म का मार्तण्ड चाहे,<br />हो तपाता भूमि-तल को,<br />दिन प्रथम आषाढ़ का में<br />'मेघ-चर' द्वारा बुलाता<br /><br />'मेघ' जिस जिस काल पढ़ता,<br />मैं स्वयं बन मेघ जाता!<br /><br />भूल जाता अस्थि-मज्जा-<br />मांसयुक्त शरीर हूँ मैं,<br />भासता बस-धूम्र संयुत<br />ज्योति-सलिल-समीर हूँ मैं,<br /><br />उठ रहा हूँ उच्च भवनों के,<br />शिखर से और ऊपर,<br /><br />देखता संसार नीचे<br />इंद्र का वर वीर हूँ मैं,<br /><br />मंद गति से जा रहा हूँ<br />पा पवन अनुकूल अपने<br />संग है वक-पंक्ति, चातक-<br />दल मधुर स्वर गीत गाता<br /><br />'मेघ' जिस जिस काल पढ़ता,<br />मैं स्वयं बन मेघ जाता!<br /><br />झोपडी़, ग्रह, भवन भारी,<br />महल औ' प्रासाद सुंदर,<br />कलश, गुंबद, स्तंभ, उन्नत<br />धरहरे, मीनार द्धढ़तर,<br /><br />दुर्ग, देवल, पथ सुविस्त्तत,<br />और क्रीडो़द्यान-सारे,<br />मंत्रिता कवि-लेखनी के<br />स्पर्श से होते अगोचर<br /><br />और सहसा रामगिरि पर्वत<br />उठाता शीशा अपना,<br />गोद जिसकी स्निग्ध छाया<br />-वान कानन लहलहाता!<br /><br />'मेघ' जिस जिस काल पढ़ता,<br />मैं स्वयं बन मेघ जाता!<br /><br />देखता इस शैल के ही<br />अंक में बहु पूज्य पुष्कर,<br />पुण्य जिनको किया था<br />जनक-तनया ने नहाकर<br /><br /> संग जब श्री राम के वे,<br />थी यहाँ पे वास करती,<br />देखता अंकित चरण उनके<br />अनेक अचल-शिला पर,<br /><br />जान ये पद-चिन्ह वंदित<br />विश्व से होते रहे हैं,<br />देख इनको शीश में भी<br />भक्ति-श्रध्दा से नवाता<br /><br />'मेघ' जिस जिस काल पढ़ता,<br />मैं स्वयं बन मेघ जाता!<br /><br />देखता गिरि की शरण में<br />एक सर के रम्य तट पर<br />एक लघु आश्रम घिरा बन<br />तरु-लताओं से सघनतर,<br /><br />इस जगह कर्तव्य से च्युत<br />यक्ष को पाता अकेला,<br />निज प्रिया के ध्यान में जो<br />अश्रुमय उच्छवास भर-भर,<br /><br />क्षीणतन हो, दीनमन हो<br />और महिमाहीन होकर<br />वर्ष भर कांता-विरह के<br />शाप के दुर्दिन बिताता<br /><br />'मेघ' जिस जिस काल पढ़ता,<br />मैं स्वयं बन मेघ जाता!<br /><br />था दिया अभिशाप अलका-<br />ध्यक्ष ने जिस यक्षवर को,<br />वर्ष भर का दंड सहकर<br />वह गया कबका स्वघर को,<br /><br />प्रयेसी को एक क्षण उर से<br />लगा सब कष्ट भूला<br /><br />किन्तु शापित यक्ष<br />महाकवि, जन्म-भरा को!<br /><br />रामगिरि पर चिर विधुर हो<br />युग-युगांतर से पडा़ है,<br />मिल ना पाएगा प्रलय तक<br />हाय, उसका शाप-त्राता!<br /><br />'मेघ' जिस जिस काल पढ़ता,<br />मैं स्वयं बन मेघ जाता!<br /><br />देख मुझको प्राणप्यारी<br />दामिनी को अंक में भर<br />घूमते उन्मुकत नभ में<br />वायु के म्रदु-मंद रथ पर,<br /><br />अट्टहास-विलास से मुख-<br />रित बनाते शून्य को भी<br />जन सुखी भी क्षुब्ध होते<br />भाग्य शुभ मेरा सिहाकर;<br /><br />प्रणयिनी भुज-पाश से जो<br />है रहा चिरकाल वंचित,<br />यक्ष मुझको देख कैसे<br />फिर न दुख में डूब जाता?<br /><br />'मेघ' जिस जिस काल पढ़ता,<br />मैं स्वयं बन मेघ जाता!<br /><br />देखता जब यक्ष मुझको<br />शैल-श्रंगों पर विचरता,<br />एकटक हो सोचता कुछ<br />लोचनों में नीर भरता,<br /><br />यक्षिणी को निज कुशल-<br />संवाद मुझसे भेजने की<br />कामना से वह मुझे उठबार-<br />बार प्रणाम करता<br /><br />कनक विलय-विहीन कर से<br />फिर कुटज के फूल चुनकर<br />प्रीति से स्वागत-वचन कह<br />भेंट मेरे प्रति चढा़ता<br /><br />'मेघ' जिस जिस काल पढ़ता,<br />मैं स्वयं बन मेघ जाता!<br /><br />पुष्करावर्तक घनों के<br />वंश का मुझको बताकर,<br />कामरूप सुनाम दे, कह<br />मेघपति का मान्य अनुचर<br /><br />कंठ कातर यक्ष मुझसे<br />प्रार्थना इस भांति करता-<br />'जा प्रिया के पास ले<br />संदेश मेरा,बंधु जलधर!<br /><br />वास करती वह विरहिणी<br />धनद की अलकापुरी में,<br />शंभु शिर-शोभित कलाधर<br />ज्योतिमय जिसको बनाता'<br /><br />'मेघ' जिस जिस काल पढ़ता,<br />मैं स्वयं बन मेघ जाता!<br /><br />यक्ष पुनः प्रयाण के अनु-<br />रूप कहता मार्ग सुखकर,<br />फिर बताता किस जगह पर,<br />किस तरह का है नगर, घर,<br /><br />किस दशा, किस रूप में है<br />प्रियतमा उसकी सलोनी,<br />किस तरह सूनी बिताती<br />रात्रि, कैसे दीर्ध वासर,<br /><br />क्या कहूँगा,क्या करूँगा,<br />मैं पहुँचकर पास उसके;<br />किन्तु उत्तर के लिए कुछ<br />शब्द जिह्वा पर ना आता<br /> <br />'मेघ' जिस जिस काल पढ़ता,<br />मैं स्वयं बन मेघ जाता!<br /><br />मौन पाकर यक्ष मुझको<br />सोचकर यह धैर्य धरता,<br />सत्पुरुष की रीति है यह<br />मौन रहकर कार्य करता,<br /><br />देखकर उद्यत मुझे<br />प्रस्थान के हित,<br /><br /> कर उठाकर<br />वह मुझे आशीष देता-<br /><br />'इष्ट देशों में विचरता,<br />हे जलद, श्री व्रिध्दि कर तू<br />संग वर्षा-दामिनी के,<br />हो न तुझको विरह दुख जो<br />आज मैं विधिवश उठाता!'<br /><br />'मेघ' जिस जिस काल पढ़ता,<br />मैं स्वयं बन मेघ जाता!Moglihttp://www.blogger.com/profile/10882385754551486879noreply@blogger.com